सफर में दिल्ली कुछ देर रुकेंगे
कुछ पुराने लोगों से मिलनेगे ,
दुकानदार से नोक-झोंक , रिक्शा से खिच - खिच करेंगे
शहर देखेंगे, कुछ बढ़िया चीज़ें खाएंगे।
हम यह सोच कुछ उत्साहित थे,
जब दिल्ली आया तो सावधान हो गए
पुराना अनुभव था लोग बेवक़ूफ़ बना सकते है,
इस लिए New Delhi में metro से जाना निश्चित करे।
Metro की लम्बी पंक्ति व प्रक्रिया,
सब लोग चुप चाप खड़े, अपने में व्यस्त,
रेल आने पर पंक्ति तोड़ी, हुई धक्का मुक्की व् seat की दौड़ ,
फिर सब हुए चुप अपने - अपने में रहे खोये- खोये ।
Train स्वयं पूरी जानकारी देती थी ,
रास्ता , स्टेशन कुछ पूछना ही नहीं ,
लोग है बहुत, पर किसी को दूसरे की जरूरत नहीं,
इतने अजनबी, कि आपस में कोई Hello या बात भी नहीं।
कहाँ गए वो खुश दिल लोग , वो अपनापन ,
वो जोर से बोलना , छोटे -छोटे दिखावे करना ,
दिल्ली का सर दर्द , लोगों का लगातार बक -बक करना,
कितना बदल गया वह जहाँ जिसे बचपन से था जाना ।
आराम से हम New Delhi की metro में सैर करते रहे,
एक मुस्क़ुएरहत , एक वार्तालाप , काश कोई नोक झोंक ही करे,
मन में खालीपन , मस्तिष्क में उलझन महसूस करते हुए ,
हम New Delhi में अपनी यादों की दिल्ली ढूँढ़ते रहे ।
नम आँखों से ,
हम New Delhi में दिल्ली ढूँढ़ते रहे , दिल्ली ढूँढ़ते रहे।