यह चकाचौंध है दिखावा सब,
उजाला बहार सन्नाटे भीतर,
है कोई बीमार, तो कोई अकेला,
कैसा यह समाज, कैसा है मेला ।
न हो खिन्न, न रहें अनभिन्न,
न घबराए या हो जाए परेशां
हो धार्मिक रहें सच्चाई से,
परिपूर्ण हो अपनी अच्छाई में ।
जब मुक्त होंगे स्वाधीनता में,
और सूने चेहरे खिल जायेंगे,
तब खुशियां आएँगी,
तब खुशियां आएँगी
तब खुशियां आएँगी । ।
किसी को आदर पूर्वक सुनना तुम,
जो हक़ उसका, न छीनना तुम,
अपनत्व भाव से हो व्यवहार,
शांत, सहज, न कोई अत्याचार ।
खूब खेलें नंगे पाँव आंगन में,
सब खुलकर बताएँ, अनुभव अपने,
हो उल्लास बड़ा, बतियाने में ।
जब चमकेंगी आँखें तारो सी,
और मन से मन मिल जायेंगे,
तब खुशियां आएँगी,
तब खुशियां आएँगी,
ढेरों खुशियां आएँगी,
अम्बर तक छा जाएँगी ।।
--सुश्री मधुर खन्ना
